Friday, March 7, 2008

तन्हाइयों से नाता रहा !

भीड़ में भी तन्हाइयों से नाता रहा
वो ऊँचा दरख़्त आँधियों में गाता रहा|

जब बौराती डाली तो महकती थीं फ़िज़ाये
लकड़ी के बदले खुशबू तो महज़ घाटा रहा|

लगेगा मंदिर में या मस्ज़िद की शान होगा
बिना पूछे मज़हब राही को फल खिलाता रहा|

सब कुछ देता था उसने कुछ ना खाया कभी
इतने पर भी बच्चों के पत्थर ख़ाता रहा|

आह निकलती थी हर कुल्हाड़ी के वार पर
होंठों में भरे मुस्कान अपनों से दगा पाता रहा|

कूकती थी कोयल बसंत भर पीयू-पीयू
वो कटा तो परिंदों में पसरा सन्नाटा रहा|

5 comments:

abhi said...

wah vipul, ek vraksha ki vedna ka badi khubsurti se chitran kiya hai.kulhadi ke var ka;bina majhab puche vraksha ka fal khilana tatha bacchon ke patthar sahna ye panktiyan vraksha ka manushya se gahra rishta batati hai.

गौरव सोलंकी said...

भाव बहुत अच्छे हैं विपुल और यदि यह गज़ल में तुम्हारा पहला प्रयास है तो सराहनीय भी है।
भविष्य में प्रयास करना कि काफ़िये की ऐसी गलतियाँ न हों।
जैसा कि दूसरे और छठे शे'र में टा से बन रहा है और बाकी जगह ता से।
सीखते रहो।

रंजू भाटिया said...

आह निकलती थी हर कुल्हाड़ी के वार पर
होंठों में भरे मुस्कान अपनों से दगा पाता रहा|

यह शेर बहुत अच्छा लगा .. मुझे तुम्हारी लिखी यह गजल बहुत पसंद आई इसके भाव बहुत अच्छे लगे !!

Pabbllooo.... said...

gud one vipul....
subject is nice enough

Sajal Ehsaas said...

diversity of the ideas in one poem is good....kai alag alag tarah ke sawaal uthe hai