Thursday, February 28, 2008

तुम्हारा क्या दोष !

गर बंद अंधेरे कमरे में
चादर के अंदर,
लगातार बहते आँसू
तकिया गीला कर दें
तो इसमें
तुम्हारा क्या दोष?

तुमने तो
कभी "हाँ" बोला ही नहीं,
मेरे इन आँसुओं को,
अपनी एक मुस्कान से
तोला ही नहीं
एकतरफ़ा प्यार...
तुम्हारा क्या दोष?

त्योहारों पर उदासी
कुछ ज़्यादा होती है!
होली,दीवाली
सब बेमानी सी लगती है
तुम्हारी यादें
कुछ-कुछ अमरबेल की तरह हैं..
दिल पर लिपट कर,
सारी ख़ुशी चूस जाती हैं!
ख़ैर...
तुम्हारा क्या दोष?

रात भर छत पर बैठकर,
तारों में
तुम्हारी सूरत ढूंढता हूँ!
हाथ में प्रेम रेखा नहीं है,
चाकू से नयी गोद लेता हूँ
दर्द तो होता है,
नाकामी का ख़ून भी बहुत बहता है
पर छोड़ो...
तुम्हारा क्या दोष?

तुम्हें बदनामी का डर था
मना कर दिया...
अब में कभी प्रेम पर नहीं लिखता!
दिल के ज़ज़्बातों का दरिया,
शब्दों के बाँध पर नहीं ठहरता
पता है..
प्रेम पर लिखे बिना
कोई कवि संपूर्ण नहीं होता!
ख़ैर जाने दो...
तुम्हारा क्या दोष?

रोज़ दिखती हो,मिलती हो
पर मेरी तरफ़ देखती भी नहीं!
सोचता हूँ,
एक बार तो देखना पड़ता होगा
यह देखने के लिए
कि कहाँ नहीं देखना है!
आह्!
तुमको भी कितना ज़ब्त करना है!
पर सुनो...
इसमें मेरा क्या दोष?

नींद में बड़बड़ाता हूँ
चिल्लाता हूँ,रोता हूँ
दोस्त कहते हैं
तुझे कुछ बीमारी है
क्या बीमारी है?
मेरे तकिये में भरी रूई
जानती है...
कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं !

3 comments:

Anonymous said...

वाह विपुल जी क्या खूब लिखा है आपने.. लफ्ज़-ब-लफ्ज़ हक़ीकत ! ऐसा ही होता है एकतरफ़ा प्यार में ! बहुत सुंदर ! ऐसे ही लिखते रहिए..

abhi said...

vipul, kya bat hai tumhari kavita ek tarfa pyar aur virah ki vedna ka accha udaharan prastut karti hai.ye jivan ki sabse badi sacchai hai;tumne jo shabdon ka prayog kiya hai wo bahut gahra arth batate hai nishchit roop se jisne bhi pyar kiya hoga tumhari kavita ki vedna ko samjhega aur logon ko bhi pasand ayegi.mujhe last line takiye mein bhari rui ka prayog bahut accha laga.

Unknown said...

Dear Vipul Bahut sahi likha hai.. aap ne kuch aur ...