अपने शिकार पर आँखे गड़ाए
आकाश में मंडराती चील
कब से नहीं देखी?
कब से नहीं देखा..
वो तेज़ शिकारी गिद्ध..
शायद अब
भयानक रस वाली कविताओं तक ही
सीमित हैं यह सब !
कब से नही देखे
लंबी गर्दन वाले
साइबेरियन पक्षी !
झील के किनारे बैठे ,
मछलियों की दावत उड़ते,
विदेशी मेहमान..
शायद टूट गयी है अब
"अतिथि देवो भव" की
गौरवशाली परंपरा !
बसंत आया और चला गया चुपचाप !
उदास था वो..
कोयल नही कूकी इस बार
उसकी आवाज़ सुनकर बौराते थे आम
इस बार नहीं बौराए !
पित्र-पक्ष में इंतज़ार करता रहा मैं
थाली में लेकर पुरखों का ग्रास !
आस में..
वे आएँगे कौओं का रूप लेकर
स्वीकार करेंगे हमारा स्नेह..
इस बार नहीं आए !
आख़िर क्यों?
क्यों नहीं आते अब ये चील ,गिद्ध
कौए और कोयल ..
शायद व्यस्त हैं
डिस्कवरी चैनल पर!
या फिर ..
हो गये हैं लुप्त !
हवा में बढ़ता ज़हर
ज़्यादा ज़हरीला लगता है इन्हे..
हमारी बात और है !
वे इंसान तो नहीं ..
जो रोज़ मर-मर कर जिएं
वे बस एक बार मरते हैं
सदा के लिए !
हम इंसान हैं..
चेतने का सवाल ही नहीं !
हाँ, पछताएँगे ज़रूर
जब यह सब गायब हो जाएँगे
और हमारे बच्चे
पूछेंगे हमसे ...
पापा !
ये चिड़िया कैसी होती थी?
2 comments:
ek achhi aur respnsible soch ko jis tarah innovative aur behatareen dhang se aap prastut karte hai wo bahut impress karta hai mujhe....bilkul fresh treatment hai....aur sach mein ghazab hai.....
kyaa baat kahee hai jee !!!
jee khush kar diya aapne.
yaa shayad udaas?
pata nahee......
baharhaal...
ek baat ki tasalli hai-
aap honge , bachchon ko bataane ke liye , chidhiya kaisi hoti thi .
unhe discovery par mahi dhoondhna padega
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