Thursday, February 28, 2008

सावन

सीधे-सादे लड़के को इक प्यार में पड़ते देखा है ,
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |

सावन में उनकी अठखेली,को छुप कर तब देखा था,
जब देह समूची रही तर-बतर ,दामन पूरा भीगा था |
बैचैन हुआ बादल भी फिर क्या !जम कर उन पर बरसा था ,
काश !कि मैं भी नीरवो होता,तन पर उनके ढलका था !

कीड़े को जाले में फ़स कर,मरते मैने देखा है ,
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है|

अनभिज्ञ वो यौवन की दस्तक से,इठलाती बलखाती थी,
आगोश में सावन की बूंदो को,लेकर वो इतराती थी|
इधर-उधर लहराकर भीगे आँचल को वो गाती थी ,
मैं चातक स्वाती-नक्षत्र की वो अनुपम जलराशि थी |

सावन के ही खेत में प्रेमी,सपनों को क्यों बोता है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |

कोई और हृदय में उनके पर,चातक को प्यासा रहना है ,
बूंदो का ताबूत बनाना,अरमानों को मरना है |
सारे सावन के जल को,आँसू से ख़ारा करना है,
खारे जल से किस्मत के लेखे को धो कर पढ़ना है |

ज़िंदा लाश बनाता है जो,शिल्पी मैने देखा है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |

म धूशाला है व्यर्थ अगर ना,पास में प्यारा साकी है ,
बरस गया सारा सावन पर पीर ह्रदय में बाक़ी है !
गली हुई नयनो के नीर से मेरी जीवन पाती है ,
यादें जैसे अमरबेल हैं,मुझको चूसे जाती हैं |

लगे कुरेदने यादों को,औज़ार कोई यह पैना है !
सावन प्यारी मिलन की बेला ग़म भी मैने झेला है |

सावन इक झरने के जैसा,ग़म जिस से झर- झर झरता है,
पेड है यह स्नेह का जिसपर,विरह का फल भी लगता है !
पता चला सावन पर कविता कोई कवि क्यों करता है,
रेगिस्तान है बूंदों का यह विरही प्यास से मरता है |

हाय!अधूरी बनी हाथ में,मेरी प्रेम की रेखा है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |

1 comment:

abhi said...

shandar vipul, tumne sawan ke mausam ka varnan ek virahi ke roop mein bahut shandar kiya hai.tumhari kavita ke ek-ek shabd virah ki gahrai ka varnan karte hai.mujhe kavita bahut pasand ayi khastaur pe 'mai chatak swati nakshatra ka aur sawan ke khet mein fasal ka bona aur sawan ke jal ko ansuon se khara karna 'bahut acchi lagi.