गर बंद अंधेरे कमरे में
चादर के अंदर,
लगातार बहते आँसू
तकिया गीला कर दें
तो इसमें
तुम्हारा क्या दोष?
तुमने तो
कभी "हाँ" बोला ही नहीं,
मेरे इन आँसुओं को,
अपनी एक मुस्कान से
तोला ही नहीं
एकतरफ़ा प्यार...
तुम्हारा क्या दोष?
त्योहारों पर उदासी
कुछ ज़्यादा होती है!
होली,दीवाली
सब बेमानी सी लगती है
तुम्हारी यादें
कुछ-कुछ अमरबेल की तरह हैं..
दिल पर लिपट कर,
सारी ख़ुशी चूस जाती हैं!
ख़ैर...
तुम्हारा क्या दोष?
रात भर छत पर बैठकर,
तारों में
तुम्हारी सूरत ढूंढता हूँ!
हाथ में प्रेम रेखा नहीं है,
चाकू से नयी गोद लेता हूँ
दर्द तो होता है,
नाकामी का ख़ून भी बहुत बहता है
पर छोड़ो...
तुम्हारा क्या दोष?
तुम्हें बदनामी का डर था
मना कर दिया...
अब में कभी प्रेम पर नहीं लिखता!
दिल के ज़ज़्बातों का दरिया,
शब्दों के बाँध पर नहीं ठहरता
पता है..
प्रेम पर लिखे बिना
कोई कवि संपूर्ण नहीं होता!
ख़ैर जाने दो...
तुम्हारा क्या दोष?
रोज़ दिखती हो,मिलती हो
पर मेरी तरफ़ देखती भी नहीं!
सोचता हूँ,
एक बार तो देखना पड़ता होगा
यह देखने के लिए
कि कहाँ नहीं देखना है!
आह्!
तुमको भी कितना ज़ब्त करना है!
पर सुनो...
इसमें मेरा क्या दोष?
नींद में बड़बड़ाता हूँ
चिल्लाता हूँ,रोता हूँ
दोस्त कहते हैं
तुझे कुछ बीमारी है
क्या बीमारी है?
मेरे तकिये में भरी रूई
जानती है...
कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं !
Thursday, February 28, 2008
सावन
सीधे-सादे लड़के को इक प्यार में पड़ते देखा है ,
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
सावन में उनकी अठखेली,को छुप कर तब देखा था,
जब देह समूची रही तर-बतर ,दामन पूरा भीगा था |
बैचैन हुआ बादल भी फिर क्या !जम कर उन पर बरसा था ,
काश !कि मैं भी नीरवो होता,तन पर उनके ढलका था !
कीड़े को जाले में फ़स कर,मरते मैने देखा है ,
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है|
अनभिज्ञ वो यौवन की दस्तक से,इठलाती बलखाती थी,
आगोश में सावन की बूंदो को,लेकर वो इतराती थी|
इधर-उधर लहराकर भीगे आँचल को वो गाती थी ,
मैं चातक स्वाती-नक्षत्र की वो अनुपम जलराशि थी |
सावन के ही खेत में प्रेमी,सपनों को क्यों बोता है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
कोई और हृदय में उनके पर,चातक को प्यासा रहना है ,
बूंदो का ताबूत बनाना,अरमानों को मरना है |
सारे सावन के जल को,आँसू से ख़ारा करना है,
खारे जल से किस्मत के लेखे को धो कर पढ़ना है |
ज़िंदा लाश बनाता है जो,शिल्पी मैने देखा है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
म धूशाला है व्यर्थ अगर ना,पास में प्यारा साकी है ,
बरस गया सारा सावन पर पीर ह्रदय में बाक़ी है !
गली हुई नयनो के नीर से मेरी जीवन पाती है ,
यादें जैसे अमरबेल हैं,मुझको चूसे जाती हैं |
लगे कुरेदने यादों को,औज़ार कोई यह पैना है !
सावन प्यारी मिलन की बेला ग़म भी मैने झेला है |
सावन इक झरने के जैसा,ग़म जिस से झर- झर झरता है,
पेड है यह स्नेह का जिसपर,विरह का फल भी लगता है !
पता चला सावन पर कविता कोई कवि क्यों करता है,
रेगिस्तान है बूंदों का यह विरही प्यास से मरता है |
हाय!अधूरी बनी हाथ में,मेरी प्रेम की रेखा है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
सावन में उनकी अठखेली,को छुप कर तब देखा था,
जब देह समूची रही तर-बतर ,दामन पूरा भीगा था |
बैचैन हुआ बादल भी फिर क्या !जम कर उन पर बरसा था ,
काश !कि मैं भी नीरवो होता,तन पर उनके ढलका था !
कीड़े को जाले में फ़स कर,मरते मैने देखा है ,
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है|
अनभिज्ञ वो यौवन की दस्तक से,इठलाती बलखाती थी,
आगोश में सावन की बूंदो को,लेकर वो इतराती थी|
इधर-उधर लहराकर भीगे आँचल को वो गाती थी ,
मैं चातक स्वाती-नक्षत्र की वो अनुपम जलराशि थी |
सावन के ही खेत में प्रेमी,सपनों को क्यों बोता है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
कोई और हृदय में उनके पर,चातक को प्यासा रहना है ,
बूंदो का ताबूत बनाना,अरमानों को मरना है |
सारे सावन के जल को,आँसू से ख़ारा करना है,
खारे जल से किस्मत के लेखे को धो कर पढ़ना है |
ज़िंदा लाश बनाता है जो,शिल्पी मैने देखा है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
म धूशाला है व्यर्थ अगर ना,पास में प्यारा साकी है ,
बरस गया सारा सावन पर पीर ह्रदय में बाक़ी है !
गली हुई नयनो के नीर से मेरी जीवन पाती है ,
यादें जैसे अमरबेल हैं,मुझको चूसे जाती हैं |
लगे कुरेदने यादों को,औज़ार कोई यह पैना है !
सावन प्यारी मिलन की बेला ग़म भी मैने झेला है |
सावन इक झरने के जैसा,ग़म जिस से झर- झर झरता है,
पेड है यह स्नेह का जिसपर,विरह का फल भी लगता है !
पता चला सावन पर कविता कोई कवि क्यों करता है,
रेगिस्तान है बूंदों का यह विरही प्यास से मरता है |
हाय!अधूरी बनी हाथ में,मेरी प्रेम की रेखा है !
सावन प्यारी मिलन की बेला,ग़म भी मैने झेला है |
चाँद - भाग 1
अंतहीन समुद्र
आँखें बंद
नीरव,शांत
पूनम की रात,
चंद्रिका से दीपित
कोमल गात!
लेटा समंदर,
थका-हारा सा!
हिलती लहरों पर चाँदनी का स्पर्श..
जैसे थपकी दे माँ
सो जा..
नींद की चौकीदारी,
आकाश में
चाँद की गश्त!
अचानक पवन गतिमान,
बादलों में छिपा चाँद
चौंका समंदर!
बैचैन घबराया सा
दौड़ पड़ा..
पथरीली ज़मीन पर
बदहवास हो कर
पागल..!
पैर छिल गये उसके,
लहूलुहान हो गया
कराहता रहा,
रोता रहा,
बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..
आँखें बंद
नीरव,शांत
पूनम की रात,
चंद्रिका से दीपित
कोमल गात!
लेटा समंदर,
थका-हारा सा!
हिलती लहरों पर चाँदनी का स्पर्श..
जैसे थपकी दे माँ
सो जा..
नींद की चौकीदारी,
आकाश में
चाँद की गश्त!
अचानक पवन गतिमान,
बादलों में छिपा चाँद
चौंका समंदर!
बैचैन घबराया सा
दौड़ पड़ा..
पथरीली ज़मीन पर
बदहवास हो कर
पागल..!
पैर छिल गये उसके,
लहूलुहान हो गया
कराहता रहा,
रोता रहा,
बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..
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