अपने शिकार पर आँखे गड़ाए
आकाश में मंडराती चील
कब से नहीं देखी?
कब से नहीं देखा..
वो तेज़ शिकारी गिद्ध..
शायद अब
भयानक रस वाली कविताओं तक ही
सीमित हैं यह सब !
कब से नही देखे
लंबी गर्दन वाले
साइबेरियन पक्षी !
झील के किनारे बैठे ,
मछलियों की दावत उड़ते,
विदेशी मेहमान..
शायद टूट गयी है अब
"अतिथि देवो भव" की
गौरवशाली परंपरा !
बसंत आया और चला गया चुपचाप !
उदास था वो..
कोयल नही कूकी इस बार
उसकी आवाज़ सुनकर बौराते थे आम
इस बार नहीं बौराए !
पित्र-पक्ष में इंतज़ार करता रहा मैं
थाली में लेकर पुरखों का ग्रास !
आस में..
वे आएँगे कौओं का रूप लेकर
स्वीकार करेंगे हमारा स्नेह..
इस बार नहीं आए !
आख़िर क्यों?
क्यों नहीं आते अब ये चील ,गिद्ध
कौए और कोयल ..
शायद व्यस्त हैं
डिस्कवरी चैनल पर!
या फिर ..
हो गये हैं लुप्त !
हवा में बढ़ता ज़हर
ज़्यादा ज़हरीला लगता है इन्हे..
हमारी बात और है !
वे इंसान तो नहीं ..
जो रोज़ मर-मर कर जिएं
वे बस एक बार मरते हैं
सदा के लिए !
हम इंसान हैं..
चेतने का सवाल ही नहीं !
हाँ, पछताएँगे ज़रूर
जब यह सब गायब हो जाएँगे
और हमारे बच्चे
पूछेंगे हमसे ...
पापा !
ये चिड़िया कैसी होती थी?
Friday, March 14, 2008
Friday, March 7, 2008
तन्हाइयों से नाता रहा !
भीड़ में भी तन्हाइयों से नाता रहा
वो ऊँचा दरख़्त आँधियों में गाता रहा|
जब बौराती डाली तो महकती थीं फ़िज़ाये
लकड़ी के बदले खुशबू तो महज़ घाटा रहा|
लगेगा मंदिर में या मस्ज़िद की शान होगा
बिना पूछे मज़हब राही को फल खिलाता रहा|
सब कुछ देता था उसने कुछ ना खाया कभी
इतने पर भी बच्चों के पत्थर ख़ाता रहा|
आह निकलती थी हर कुल्हाड़ी के वार पर
होंठों में भरे मुस्कान अपनों से दगा पाता रहा|
कूकती थी कोयल बसंत भर पीयू-पीयू
वो कटा तो परिंदों में पसरा सन्नाटा रहा|
वो ऊँचा दरख़्त आँधियों में गाता रहा|
जब बौराती डाली तो महकती थीं फ़िज़ाये
लकड़ी के बदले खुशबू तो महज़ घाटा रहा|
लगेगा मंदिर में या मस्ज़िद की शान होगा
बिना पूछे मज़हब राही को फल खिलाता रहा|
सब कुछ देता था उसने कुछ ना खाया कभी
इतने पर भी बच्चों के पत्थर ख़ाता रहा|
आह निकलती थी हर कुल्हाड़ी के वार पर
होंठों में भरे मुस्कान अपनों से दगा पाता रहा|
कूकती थी कोयल बसंत भर पीयू-पीयू
वो कटा तो परिंदों में पसरा सन्नाटा रहा|
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