हद हो गयी,
जानबूझकर..
अपने बचपन के यार की
शादी में नहीं पहुँचा मैं!
वो आई थी...
वीडियो में देखा मैने
लंबे खुले बाल और लाल साडी !
नींद नहीं आई...
शराब की कंपनियाँ
कुछ और धनी हुई..
मेरे गम में
फिर रात भर रोया चाँद
और सूजी आँखें लिए
ओझल हो गया सुबह !
उफ़...
उसके होंठों से निकला था मेरा नाम
पूछा था उसने
क्यों नहीं आया मैं !
मैने मेला नहीं देखा
दो साल हो गये..
तीन से छह पिक्चर भी नहीं गया,
राधे के समोसे भी नहीं खाए
और तो और
बुधवार को मंदिर जाना भी बंद कर दिया !
संभावनाओं से डरता हूँ मैं...
उसके मिलने की,
नाम लेकर पुकारने की,
फ़ोन ना उठाने की शिकायत की,
और उन भीगी लटो को
कान के पीछे ,
धकेलने की संभावना !
इन सब से
बेइंतहा डरता हूँ मैं !
उसे देख लिया
तो दिल आँखों में उतर आएगा...
सिर्फ़ बंद आँखों से ही देखता हूँ उसे!
क्योंकि तब
असहज़ नहीं होता मैं !
खीजता और रोता भी नहीं,
दीवारों में सिर भी नहीं मारता
और उसकी तस्वीर की
फ्रेम में दबी
ज़हर की शीशी भी नहीं निकालता !
महीने में एक बार
अंजान नंबर से फ़ोन करता हूँ उसे
बस
कुछ सेकेंड तक हेलो-हेलो सुन
अपना शावर चलाता हूँ
और फिर
फुट्कर रोता हूँ देर तक
जब तक माँ ना पुकारे !
मरने से पहले ,
एक बार
उसके गले लगकर
रोना चाहता हूँ मैं
पता है असंभव है...
इसीलिए तो
चाहता हूँ
जब भी मरूं
उसके बाद मरूं
ताकि सबको बता सकूँ
अपनी अंतिम इच्छा...
भरोसा दिला सकूँ खुद को...
कि उसके कब्रिस्तान में ,
नहीं दफ़नाया जाएगा मुझे !
और
कम से कम
मरने के बाद तो ,
चैन से जी पाऊँगा मैं !