Friday, October 10, 2008

मोती गिरा गयी

ख़्वाबों में आई मह्ज़बीं नींदें उड़ा गयी
जीने का इक बहाना था वो भी चुरा गयी|

प्याले हैं वो शराब के तुम नैन ना कहना
होंठों से बिन लगाए ही ज़ालिम पिला गयी|

प्यार वो करती है छिड़कती है जां हम पर
ख़ौफ़ अपने भाई का हमको दिखा गयी|

कनखियों से देखती है वो हमें छुपकर
नज़रें मिलीं तो आज कयामत-सी आ गयी|

नौ दिन वो रही भूखी हमें पाने की खातिर
उसकी सहेली इक हमें चुप से बता गयी|

पिघली है शाम चाँद की बाहों में है झूली
महबूब को देखो मेरे कैसे लजा गयी|

कितनी अमीर याद है उसकी ज़रा सुनो
जब-जब भी आई आँख से मोती गिरा गयी|